Sri Naresa Mehata Ka Kavya Samvedana, Silpa Evam Mahaniyata
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Description
काव्य का स्थान समस्त वैचारिक सत्ता और जगत् में न केवल सर्वोपरि है बल्कि अपनी भाववाची सृजनात्मक प्रकृति के कारण उसे परमपद भी कहा जा सकता है। अन्य वैचारिक संज्ञाएँ भले ही वे धर्म, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान या अध्यात्म की ही क्यों न हों, भाववाची सृजनात्मक न होने के कारण वे किसी न किसी कारण से सीमाएँ ही हैं। इस अर्थ में काव्य ही एक मात्र निर्दोष सत्ता है। वैचारिक विराटता जब सर्जनात्मक तथा संकल्पात्मक होती है तब उस ऋतम्भरा मधुमती भूमिका की प्रतीति सम्भव है जिसके लिए धर्म, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान या अध्यात्म