Bhasha samaya evan sanvada

by S. K. Singh

★★★★★
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Description

क सकता है, वहीं दूसरी ओर भाषा की सबल एवं संवेदनात्मक सच्चाई भी वास्तविकताओं से सरोकार कराने में छिपी होती है, जो न तो लोक एव लोक-भाषा से इतर है और न ही अतिरिक्त। इन सबके केंद्र में लोक की अपनी सैद्धांतिकी होती है, जो समय के अनुभवों और जीवनसंदर्भो से अनुप्राणित होती रही है। उसने भी समय को परखा है। यहाँ हमें अपने लोक एवं भाषा को परखने के लिए यह समझना होगा कि “मनुज बली होत नहीं, समय होत बलवान, भिलन लूटी गोपिका, वही अर्जुन वहीं बाना” मतलब यह कि विपरीत समय ने ही अर्जुन जैसे योद्धा को भी नि:सहाय स्थित